shri shri Chaitanya Charitavali code 123 by Gita Press Gorakhpur
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इस पुस्तक की प्रस्तावना में प्रभुदत्त ब्रह्मचारी जी कहते हैं कि, “चैतन्यदेव के महान् जीवन में चैतन्यता का बीजारोपण तो गयाधाम में हुआ, नवद्वीप में आकर वह अंकुरित और कुछ-कुछ परिवर्धित हुआ। श्री नीलाचल (जगन्नाथ पुरी) में वह पल्लवित, पुष्पित और अमृतमय फलों वाला बन गया। उसके अमृतमय सुस्वादु फलों से असंख्य प्राणी सदा के लिये तृप्त हो गये और उनकी बुभुक्षा का अत्यन्ताभाव ही हो गया। उसकी नित्यानन्द और अद्वैत रूपी दो बड़ी-बड़ी शाखाओं ने सम्पूर्ण देश को सुखमय और शान्तिमय बना दिया। इसलिये हमारी प्रार्थना है कि पाठक इस मधुमय, आनन्दमय और प्रेममय दिव्य चरित्र को श्रद्धाभक्ति के साथ पढ़ें। इसके पठन से शान्ति सन्देहों का भंजन होगा, भक्तों के चरणों में प्रीति होगी और भगवान के समीप तक पहुँचने की अधिकारिभेद से जिज्ञासा उत्पन्न होगी। इससे पाठक यह न समझ बैठे़ कि इसमें कुछ मेरी कारीगरी या लेखन-चातुरी है, यह तो चैतन्य-चरित्र की विशेषता है। मुझ जैसे क्षुद्र जीव की चातुरी हो ही क्या सकती है? यदि इस ग्रन्थ के लेखन में कहीं मनोहरता, सुन्दरता या सरसता आदि आ गयी हो तो इन सबका श्रेय श्री कृष्णदास गोस्वामी, श्री वृन्दावनदास ठाकुर, श्री लोचनदास ठाकुर, श्री मुरारी गुप्त तथा श्री शिशिर कुमार घोष आदि पूर्ववर्ती चरित्र-लेखक महानुभावों को ही है और जहाँ-जहाँ कहीं विषमता, तीक्ष्णता, विरसता आदि दूषण आ गये हों, उन सबका दोष इस क्षुद्र लेखक को है और इसका एकमात्र कारण इस अज्ञानी की अल्पज्ञता ही है।








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